Sunday, April 5, 2020

नमस्कार दोस्तों.....

इस वेबसाइट में कुछ बातें तय होगी और कुछ बातें अचानक मौका आने पर लिखी जाएगी। हमारी इस वेबसाइट में सबसे महत्वपूर्ण कॉलम होगा ‘कड़वाहट’.यह एक ऐसा कॉलम रहेगा जिसमें उस खबर की सच्चाई होगी जो अखबारों ओर न्यूज़ चैनल में मसाले के साथ परोसी गयी होगी शायद इसीलिए इसका नाम "कड़वाहट" रखा गया है कहा भी गया है की सच हमेशा कड़वा होता है | वैसे मुझमें जानने लायक जैसा कुछ भी नही है पर जीबन के इस उतार चढ़ाव में और पत्रकारिता के इस दौर में बहुत सी ऐसी बातें , घटनाएं हुई और देखी जिसे समय समय पर "उतार चढ़ाव" कॉलम में लिखता रहूंगा यह एक मात्र मेरे जीबन में घटी घटनाओं पर लिखा जाएगा जिसमे मेरी खट्टीमीठी पत्रकारिता की यादे होगी और हर उस शख्शियत से आपकी मुलाकात होगी जिन्होंने मुझे इस सफर में हर कदम साथ दिया ओर उनका साथ निरंतर जारी है इसी के साथ बढ़ते है आगे....

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बात तब की है जब में मध्यप्रदेश के जिला भिंड में रहता था वैसे मेरा पुश्तेनी मकान ओर दुकान आज भी वही है पर अब भिया इंदौरी हो गए है आज से 10 साल पहले मेने भिंड को अलविदा कह दिया वहां हमारी एक कपड़े की दुकान थी और उसे में चलाया करता था पर जब लगा की शायद मुझे दुकान चलाना रास नही आएगा और शायद इस बात को इस तरह कहा जाए कि इतना पेशेंस रखना मेरे वश की बात नही है तब लगा की कुछ करना चाहिए और इस जगह से निकल कर कही बड़ी जगह करना चाहिए तो फिर मेने मेरे दादा जी से कहा वैसे में अपने दादा जी को "बाबू" कह कर बुलाता हू ओर मुझे भी नही पता क्यों शुरू से ही सबको कहते हुए सुनते आ रहा हू तो में भी कहने लगा, जब उन्हें बताया की में अब यहां नही रहना चाहता ओर मुझे बाहर निकलना है यहां से तो उनका सीधा एक ही जबाब था की रहो जहां भी पर तुम्हे बेचने तो कपड़े ही है बाहर रह कर तुम किराये की दुकान ले कर उसे चलाओगे तो फिर यहां क्यों नही जो अपनी खुद की पुश्तेनी दुकान है ।।

दोस्तो तब लगा भी यही की में करूंगा क्या बाहर जा कर बेचने तो कपड़े ही है पर कहते है ना की एक सपना जब दिन में देखते है तो वह रातों की नींद भी ले लेता है इसी तरह मेने पत्रकारिता का सपना देखा था पता नही क्यों बचपन से ही जब भी अखबार पढ़ता तो ऐसा लगता था की शायद कभी कुछ ऐसा हो की अखबार में मेरा नाम आए ओर लोग पहचाने की अरे ये तो अपना पीयूष है।। नाम आये से ये बिल्कुल नही है की किसी घटना या आपराधिक गतिविधियों में नाम आए ,नही तो यहां होशियार लोगो की कमी नही है सोचे की अच्छा गुंडा बनना था ।। किसी भी खबर में नाम आये या फिर कुछ ऐसा कर सकू जो पब्लिश हो तो लोग देखे ओर पढे ,, जब यह बात बाबू को बताई तो वह हँसने लगे ओर बोले बेटा कपड़े बेचो ओर अगर इस से मन भर गया हो तो आज कल रेडीमेट का काम ज्यादा चल रहा है तो कपड़े की जगह रेडीमेट की दुकान चालू कर दो और रही बात पत्रकारिता की तो पत्रकार तो हमारे खानदान में दूर दूर तक कोई भी नही है ओर तुम्हे पता है की कितना रिस्की रहता है उनका जीबन जैसे ही रिस्क शब्द उन से सुना तो कान खड़े हो गए क्यों की पानी तो चम्बल नदी का पिया था यो बस कह दिया अब जो भी करेगे यहां से निकल कर करेगे तो बोले जाना कहा है ग्वालियर क्यों की तब अगर भिंड से बाहर जाने की बात होती भी थी तो सिर्फ एक ही नाम ज्यादातर वहां के लोगो को आता था वह था "ग्वालियर" क्यों की बिल्कुल नजदीक था बड़ा शहर था पर मेने कहा नही एक ऐसी जगह जहां ना कोई रिश्तेदार हो ओर ना कोई पहचान बाला जो बोले अरे ये तो उनका "मोड़ा" है हमारे यहां वहां की भाषा में लड़का लड़की को " मोड़ा मोड़ी" बोला जाता है फिर क्या था शुरू हो गया जगह का चयन कुछ समय बाद बाबू ने ही इंदौर का नाम सुझाया आपको जानकर हैरानी होगी की आज से 10 साल पहले सिर्फ इंदौर है सुना ही था बस हमने, मेने कहा की सुना तो है ओर अपने मध्यप्रदेश में ही है "मिनी मुंबई" कहा जाता है तो बस बाबू के साथ आ गए इंदौर पहली बार जब यहां आये तो उनके एक परिचित रहते थे यहां जिन्हें बाबू ने कभी उन्हें भिंड में अपने घर पर किराये पर रखा था ओर आज वह उनका परिबार इंदौर बस चुका था उनसे मिले और बात हुई उन्हें बताया की इसे यहां सेट होना है इंदौर में तो इसके लिए एक दुकान भी देखना है छोटी सी किराये पर यहां यह रेडीमेट का काम करेगा उन्होंने मुझे अपनी घर की छत पर बना एक कमरा किराये पर दे दिया मतलब कभी वो हमारे किरायेदार थे ओर आज हम उनके और फिर यहां से शुरू हुआ भिंड के मोडा का इंदौरी भिया बनने का सफर।।

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इंदौरी भिया....

जब दुकानों की सर्चिंग शुरू हुई तो दुकान भी उनके घर के पास ही मिल गयी जहां मुझे रेडीमेट का माल दिला कर बैठा दिया गया ओर बाबू दोबारा भिंड के लिए निकल गए अब में सिर्फ कपड़े की जगह रेडीमेट , और भिंड की जगह इंदौर में बेचने लगा हर रोज सिर्फ यही एक बात आती की कैसे कुछ हो पाएगा एक तो नौकरी ऊपर से बिल्कुल अलग कोई जानता भी नही है इस फील्ड में कुछ आता भी नही है तब एक दिन अचानक नाई की दुकान पर नाई ने दाढ़ी पर उस्तरा चलाते चलाते बताया की उसके एक परिचित है जिन्होंने साप्ताहिक अखबार निकालना शुरू किया है ओर वह उसमे बड़े बड़े खुलासे कर रहे है तो कहते है ना किसी प्यासे व्यक्ति को पता चल जाए की वह जहाँ खड़ा है उसी के पास ठंडे पानी की मशीन लगी है तो चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है वैसे ही एक मुस्कान मेरे चहरे पर आ गयी मेने तुरंत उससे कहा की मुझे उनसे एक काम है वह मुझे उनका नंबर दे दें उससे नंबर मिलते ही मेने उन्हें फोन लगा दिया और अपने बारे में बताने के बाद उनसे मिलने का समय लिया और जा पहुचा पहली बार इंदौर के एबी रोड पर स्थित प्रेस काम्प्लेक्स उनका ऑफिस वही था वह सज्जन भी सरल और मिलनसार निकले जब उन्हें अपने बारे में बताया ओर अपनी स्थिति बताई की में अभी रेडीमेट की दुकान चलाता हूं और अब से मुझे आपके साथ काम करना है और अखबार में खबरें लिखना है तो वह बोले तुम्हे जब भी दुकान से समय रहे आते रहा करो और थोड़ा - थोड़ासमझो की कैसे खबर लिखी जाती है कैसे काम होता है पर उन्हें में कैसे समझाता की जिस काम के लिए वह समय निकाल कर आने के लिए कह रहे है वही मेरा मुख्य लक्ष्य है और उस काम से मुझे समय निकाल कर दुकान पर जाना है खैर मेने भी उनकी बात पर हाँ में सिर हिला दिया औऱ कुछ देर तक बैठने के बाद वहां से दुकान के लिए चला गया दुकान पर बैठे बैठे सोचा की अब हर रोज कम से कम 3 घण्टे के लिए तो वहां जाऊगा ही पर जब पहले दिन गया तो शाम को ही लौटा उनके ऑफिस से इसी तरह कुछ दिनों तक उनके ऑफिस पर समय ज्यादा दिया ओर दुकान पर कम नतीजा निकला की जिन्होंने हमे अपने यहां रुकवाया था उन्हीने बाबू को फोन कर के दुकान अधिकांश समय बंद रहने की सूचना दे दी बाबू का फोन मेरे पास आ गया उन्होंने कारण जाना मुझ से दुकान बंद रहने का तो मेने उन्हें पूरी बात बताई फिर क्या था उनका भिंड की भाषा में हुआ बढ़िया से प्रवचन शुरू और ऐसे ही देखते देखते दुकान पूरी तरह बंद-बंद-बंद।।।

आज पीयूष भिया पिछले 8 सालो से इंदौर में पत्रकार है !

हर रोज की इस प्रतिस्पर्धा में बहुत से बड़े ओर अच्छे संस्थानों में बहुत ही वरिष्ठ लोगो के साथ काम करने का अनुभव मिला और लगातार मौका मिल भी रहा है आज देश के सबसे तेज़ी से बढ़ते न्यूज़ चैनल जनतंत्र टीवी में "विशेष संवाददाता" के पद पर हूं मेरे इस सफर में जिन्होंने हर कदम पर साथ दिया उनका दिल से आभार मानता हू और जिंदगी की अंतिम सास तक मानता रहूगा,

अभी तक के सफर में पत्रकारिता के दौरान बहुत से अनुभव हुए कुछ बुरे, कुछ बहुत बुरे, कुछ बढ़िया, कुछ अच्छे, कुछ बहुत.......अच्छे शेष है!!!!

नया अध्याय.....

नवंबर 2018 से फिर एक नया अध्याय शुरू हुआ अध्याय का नाम था "कड़वाहट न्यूज़ नेटवर्क" सबसे पहले तो में आपको बता दूँ की नाम "कड़वाहट" क्यों रखा गया देश के महान संतो में शुमार राष्ट्रीयसंत मुनि श्री तरुण सागर जी महार के समाधि का समाचार प्राप्त हुआ एक दिन अचानक से ही उनकी उनके प्रवचन की एक पुस्तक आती थी जिसका नाम था "कड़वे प्रवचन" जब उनकी समाधि की क्रिया में टीवी पर देख रहा था तब मेने सुना की उनके प्रवचन की जो श्रृंखला चली आ रही थी कड़वे प्रवचन भाग 1 से ले कर 10 तक की वो अब रुक चुकी है मतलब अब उनकी पुस्तक नहीं छपेगी , उन दिनों में अपने न्यूज़ ब्रांड के लिए नाम ही खोज रहा था तो मुझे लगा की क्यों ना हम भी हमारे ब्रांड का नाम "कड़वाहट न्यूज़ नेटवर्क " रखे क्यों कि उनके प्रवचन का नाम जरूर "कड़वे प्रवचन" हुआ करता था पर वह समाज में एक सच्चाई उजागर करते थे ओर समाज को एक नई दिशा देने का काम किया करते थे , और मेने उनके प्रवचन के हर भाग को पढ़ा था उनके प्रवचन सिर्फ जैनों के लिए ही नहीं हुआ करते थे बल्कि जन-जन के लिए हुआ करते थे शायद इसी लिए उन्हें राष्ट्रीय संत की उपाधि से नवाजा गया था , और अचानक से उनकी समाधि ने जहाँ सब को स्तब्ध कर दिया था वही इस देश ने एक महान संत को खो दिया था , पर कहते है की महान संत कभी भी दूर नहीं होते उनके विचार ओर उनका आशीर्वाद कही ना कही दिखता ही है ,

ये हुई नाम कड़वाहट चुनने की कहानी...

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अब हम बताते है "कड़वाहट न्यूज़ नेटवर्क" की शुरुआत की कड़वाहट की शुरुआत सबसे पहले एक नेशनल मैगजीन के रुप में हुई जो एक मासिक मैगजीन है उसके बाद शुरू हुआ कड़वाहट न्यूज़ नेटवर्क का न्यूज़ चैनल " knn news" जो की प्रमुख केबल नेटवर्क के साथ ही पूरी तरह से "e मीडिया" नेटवर्क है डिजिटल भारत के बदलते इस दौर में अगर व्यक्ति के पास किसी चीज की कमी है तो वो है वक्त हमने यह समझा भी ओर महसूस भी किया इस लिए हमने हमारे प्रिय पाठकों ओर हमारे दर्शको को दिया e मैगजीन , ओर उनका न्यूज़ चैनल उनके स्मार्टफोन में अब उन्हें देश, विदेश , और अपने शहर , और गांव की खबरों के लिए टीवी के सामने वक्त निकाल कर बैठना नहीं पड़ता वो मात्र एक टच से हर छोटी और बड़ी खबरों से रूबरू हो सकते है वो भी बिना अपना कीमती वक्त गवाये , हमने हमेशा से ही कोशिश की है की खबरों को मात्र एक सूचना समझ कर ना दिया जाए बल्कि शहर में घटित हो रहे अपराधों से हमारे पाठको ओर दर्शको को सचेत भी किया जाए, इस लिए हमने खबरों को मिर्च मसाला लगा कर परोसने के जगह सिर्फ उन्हें समाज में हो रहे अपराध और भ्रष्टाचार से अवगत कराया ओर निरंतर कराते आ रहे है और मुझे इस बात की बेहद खुशी भी है की हमें पसंद भी किया जा रहा है .... बस सफर जारी है , आपकी उम्मीदों पर खरे उतरने का ...और देश में नई पहचान बनाने का... सबके सहयोग के लिए दिल से धन्यवाद , दिल से आभार,!!!

जल्द फिर लिखेंगे, लिखने योग्य !!